Tuesday, August 20, 2019

कश्मीर पर नेहरू को विलेन बनाना कितना सही

इमैनुएल कहते हैं, "अब यही मेरा काम है और यही मेरी ज़िंदगी है. ईश्वर का शुक्र है कि उसमें हम दोनों भाइयों में से एक को न्याय की लड़ाई लड़ने और मां का ध्यान रखने के लिए ज़िंदा रखा है."
"हेनरी और मैं उस कोलंबिया में पले-बढ़े जहां क़दम-क़दम पर हिंसा है. मेरे पिता नशीले पदार्थों के तस्करों के साथ थे और उनकी हत्या कर दी गई थी. हम इटली आए और हमने अपने परिवार का नाम रोशन करने की भरपूर कोशिश की."
"मेरा भाई इंजीनियरिंग की पढ़ाई ख़त्म करने वाला था. वो कोलंबिया में रहने वाले बच्चों के लिए आर्थिक मदद जुटाने की कोशिश करता था. वो हमेशा हंसता था और जीवन से भरपूर था. वो कहता था कि ये दुनिया इंसान को मिला शानदार तोहफ़ा है."
"मैं जानता हूं कि दोषी यहीं दुनिया में हैं और उन्हें सज़ा मिलनी चाहिए. मुझे भरोसा है कि मेरे भाई को न्याय मिलेगा क्योंकि पूरे इटली की यही ख्वाहिश है."
इतना कहकर छह साल के उस बच्चे ने दौड़ लगा दी.
लद्दाख वासियों के लिए केंद्र शासित प्रदेश (यूटी) की मांग एक पुराने नारे की शक़्ल में रही है. इसलिए इसका बुनियादी अर्थ समझने के लिए यहां के बाशिंदे नागरिक शास्त्र की किताबों पर निर्भर नहीं रहे.
पाँच अगस्त को भारत सरकार ने अनुच्छेद 370 के अहम प्रावधानों को हटाने और लद्दाख को जम्मू-कश्मीर से अलग कर केंद्र शासित प्रदेश बनाने का फ़ैसला किया.
बौद्ध बहुल आबादी वाले लेह में लोगों की पहली साझी प्रतिक्रिया इस फ़ैसले के स्वागत की ही दिखती है. बाज़ारों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को बधाई संदेश वाले बैनर लगे हुए हैं.
देहचिन लेह के मुख्य बाज़ार में सब्ज़ियां बेचती हैं. उनके खेत यहां से 10-15 मिनट की दूरी पर हैं. वो नहीं जानतीं कि यूटी मिलने से उनकी ज़िंदगी कैसे बदलेगी. पर कहती हैं कि इससे उनका परिवार और आस-पास के लोग बहुत ख़ुश हैं.
टूटी-फूटी हिंदी में वो कहती हैं, "पहले हम लोग जम्मू-कश्मीर के नीचे बैठता था. अब अपनी मर्ज़ी का हो गया."
लद्दाख के 'कश्मीर के नीचे बैठने' की 'पीड़ा' यहां बहुत लोगों की ज़ुबान पर है और लोग इसे अपनी संस्कृति के स्वतंत्र अस्तित्व का भावुक मसला बताते हैं.
वे मानते हैं कि कश्मीरी कल्चर, वहां के नेता और उनकी राजनीतिक प्राथमिकताओं का लद्दाख से, ख़ास तौर से लेह से कोई रिश्ता नहीं है. इसलिए उनके ख़ुश होने को इतना ही काफ़ी है कि वे 'कश्मीरी नेताओं की रहनुमाई' से मुक्ति पा गए हैं.
यहां बहुत लोग यह महसूस करते हैं कि जम्मू-कश्मीर विधानसभा में पर्याप्त प्रतिनिधित्व न होने से विकास योजनाओं और फंड के संबंध में उनके साथ भेदभाव होता रहा है.
किरगिस्तान में पूर्व भारतीय राजदूत, लेखक और राजनीतिक विश्लेषक पी. स्तोबदान लेह के रहने वाले हैं और केंद्र शासित प्रदेश के मसले पर भी लिखते रहे हैं. वो मानते हैं कि लोग इसे एक ग़ुलामी की तरह देखते थे.
वो कहते हैं, "जम्मू-कश्मीर की साठ फ़ीसदी ज़मीन लद्दाख में है लेकिन कश्मीर घाटी के 15 फ़ीसदी लोग लद्दाख का वर्तमान और भविष्य तय करते थे. शेख़ अब्दुल्ला या कोई भी हो, वो लद्दाख के लोगों के लीडर तो कभी नहीं थे. न कोई ख़ून का रिश्ता था, न आत्मीय संबंध था. लेकिन हर मंच पर वे लोग ही हमारा प्रतिनिधित्व करते थे. यह एक अन्याय था. यह यहां के लोगों के लिए अपमान की तरह था."
तो एक ख़ुशी स्वतंत्र सांस्कृतिक अस्तित्व की बहाली की है और दूसरी ख़ुशी विकास और रोज़गार की नई उम्मीदों से जुड़ी है. लोग मानते हैं कि यूटी का दर्ज़ा मिलने के बाद यहां नए उद्योग आएंगे तो स्थानीय लोगों के लिए कमाई के साधन बढ़ेंगे.
कई जानकार ये भी कहते हैं कि लद्दाख में कई प्राकृतिक संसाधन हैं. सौर ऊर्जा उत्पादन की अच्छी संभावनाएं हैं.
पी. स्तोबदान कहते हैं, "यहां जो पानी उपलब्ध है उससे जिस पैमाने पर बिजली बनाई जा सकती है, उस पैमाने पर नहीं बनाई जा रही. कुछ निजी शोध बताते हैं कि यहां 23 गीगावॉट की सौर ऊर्जा पैदा करने की क्षमता है."
इसलिए वो ये मशविरा भी देते हैं कि निजी कंपनियों से पहले यहां सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों को आना चाहिए.
ड्राइवर का काम करने वाले सोनम तरगेश को उम्मीद है कि जब तक उनके बच्चे बड़े होंगे, शायद यहां चंडीगढ़ के स्तर का एक डिग्री कॉलेज बन जाएगा, जहां से पढ़ाई करके उनके बच्चे बड़े शहरों के छात्रों से स्पर्धा कर सकेंगे. वह मानते हैं कि अभी लेह में जो डिग्री कॉलेज है, वहां पढ़ाई अच्छी नहीं होती.

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